आज महाराज दर्शन दास जी का शहीदी दिवस मनाया जा रहा है। महाराज दर्शन दास जी द्वारा स्थापित दास धर्म पूरे विश्व में फैलता जा रहा है। दिन-प्रतिदिन इसकी शाखाएं व अनुयायी चारों ओर बढ़ती जा रही है। हमारे लिए यह एक गर्व की बात है। ज्यों-ज्यों किसी धर्म का प्रचार बढ़ता है त्यों-त्यों उसके अनुयायियों में वैचारिक मतभेद भी उभरने लगते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे जब एक परिवार के सदस्य बढ़ते हैं और उसके सदस्य अलग-अलग मकानों में रहने लगते हैं तो उनमें आपसी वैचारिक मतभेद भी उभरने लगते हैं। ऐसे में यदि परिवार के मुखिया सत्बुध्दि से काम न लें तो परिवार बिखर जाता है और यदि मुखिया समझदारी से काम लेंते हैं तो परिवार एक रहता है, मकान भले ही अलग हों पर सदस्यों में एकता रहती है। जहां एक ओर दास धर्म का विस्तार हमें गौरवान्वित कर रहा है वहीं दूसरी ओर इस परिवार के कुछ बाल-बुध्दि अनुयायियों में कुछ ऐसी उत्तेजनाऐं भी उभर रही हैं जिनको यदि समय रहते रोका न गया तो दास धर्म की एकता, अखंडता व मान-सम्मान को हानि पहुंच सकती है। ऐसी ही उत्तेजनाओं से उभरे विषयों पर चर्चा करना अतिआवश्यक हो गया है।
1- हमें बेहद दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि कुछ लोग दासधर्म को मात्र एक संदेश समझते हैं। दास धर्म धर्म कोई कानून या नियमावली नहीं है जिसे एक शासक अपने राज्य में अपनी प्रजा पर लागू कर शासन करे, जिसके तोड़ने पर प्रजा को शासक सजा दे। दासधर्म एक विचारधारा है, जिसे लोग अपनी स्वेच्छा से अपनाते हैं और त्यागते हैं। धर्म एक परम्परा है जिसे लोग केवल श्रध्दा और विश्वास से निभाते हैं। सचखण्ड नानक धाम, कंत दर्शन दरबार और सतगुरू दर्शन धाम तो वे मंदिर हैं जहां दास धर्म अनुयायी अपने गुरू महाराज के माध्यम से महाराज दर्शन दास जी के दर्शन करते हैं, इन सभी मंदिरों में आगन्तुकों के रोम-रोम में और हृदय में स्वयं महाराज दर्शन दास जी बसते हैं। धर्म एक सांस्कृतिक धरोहर है जिसे समयानुसार सवांरा और निखारा जाता है। समयानुसार समाज में नवीन परिवर्तनों के साथ-साथ आवश्यकतानुसार परम्पराओं को निभाया जाता है। धर्म पर किसी शासक का अधिकार नहीं होता बल्कि धर्मगुरू भी धर्म के अनुयायी होते हैं। किसी एक धर्मगुरू के गद्दी छोड देने से धर्म नहीं समाप्त होता। नये अनुयायियों मे नये धर्मगुरू गद्दी सम्भालते हैं ठीक उसी प्रकार जैसे परिवार के एक मुखिया के जाने के बाद नये मुखिया परिवार को सम्भालते हैं। जब एक पिता के चार पुत्र हों और सभी अपने अपने अलग मकान बनाकर अपने परिवारों की देखरेख करें तो वे सभी अपने अपने परिवारों के मुखिया ही कहलाऐंगे। वे चारों ही अपने पिता की दूसरी पीढ़ी ही कहलाऐंगे। जब वे चले जाऐंगे और उन सभी के दस पुत्र अपने अपने परिवारों को सम्भालेंगे तो वे सभी अपने परिवारों के तीसरी पीढ़ी के मुखिया माने जाऐंगे। महाराज दर्शन दास जी ने दास धर्म की स्थापना की, एक परिवार बसाया और वे दास धर्म की पहली पाताशाही के रूप में स्वीकार किए गये। हमें गर्व है कि आज दास धर्म की कई शाखाएं हैं और उनके मुखिया दूसरी पाताशाही के गुरू। सचखण्ड नानक धाम, कंत दर्शन दरबार, सतगुरू दर्शन धाम ऐसे ही अलग अलग मकानों के नाम हैं जिनमें दासधर्म परिवार के सदस्य रहते हैं। इन मकानों में रहने वाले सदस्यों के अपने अपने मुखियां हैं और दासधर्म की दूसरी पाताशाही धर्मगुरू हैं। दासधर्म केवल सचखण्ड नानक धाम, कंत दर्शन दरबार या सतगुरू दर्शन धाम का नाम नहीं है वह तो एक ऐसी विचारधारा है जो इन सभी धामों से जुड़े अनुयायियों के हृदय में विराजमान है जिसे कोई हिटलरशाही समाप्त नहीं कर सकती। जैसे जैसे इसकी शाखा बढ़ेंगी वैसे वैसे ही हमारा मान सम्मान भी बढेगा। महाराज दर्शन दास जी के उसूलों पर हमें पूर्ण विश्वास है कि आगामी वर्षां में दास धर्म और बढेगा, इसकी हजारों शाखाऐं होंगी, आने वाली नई पाताशाही के अनेकों गुरू होंगे। यह हमारे लिए और हर दास धर्म अनुयायी के लिए गर्व की बात होगी न कि द्वेश का कारण।
2- दासधर्म अनुयायियों के लिए शर्म की बात है कि कुछ लोग अपने निहित व्यावसायिक स्वार्थों के कारण महाराज दर्शन दास जी द्वारा रचित वाणी के संग्रह के प्रकाशन पर रोक लगाना चाहते हैं। महाराज की वाणी वह संदेश है जिस पर आवाम का अधिकार है। जितने लोग उसे पढेंगे या सुनेंगे उतने लोगों का जीवन सफल होगा। उनकी वाणी के प्रकाशन पर रोक लगाने का अर्थ है लाखों लोगों के हृदय को महाराज के वचनों से दूर रखना। उनकी वाणी के प्रकाशन पर रोक लगाना या उस पर एकाधिकार दर्शाना भ्रम पैदा करता है कि ऐसा चाहने वाले लोग उनकी वाणी प्रकाशन को व्यवसाय बनाना चाहते हैं, दासधर्म अनुयायियों की महाराज के प्रति आस्था का व्यावसायिक लाभ उठाना चाहते हैं। भावनात्मक व आध्यात्मिक नजरिए से तो यह अपराध है ही, कानूनी रूप से भी स्वीकार्य नहीं है क्योंकि स्वयं महाराज दर्शन दास जी ने अपनी वाणी प्रकाशन का कोई कापीराइट किसी व्यक्ति विशेष या संस्था के हक में पंजीकृत नहीं कराया था। वाणी प्रकाशन पर रोक लगाने वाले लोगों से हमारा निवेदन है कि धन कमाने के लिए और नये रास्ते अपनाएं न कि दासधर्म अनुयायियों की महाराज के प्रति भावनाओं का व्यावसायी करण न करें।
3- कुछ लोगों ने विभिन्न महाराज दर्शनदास जी के मंदिर रूपी धामों या दरबारों में महाराज की शान में गायी जाने वाली अरजोई व कीर्तनों पर आपत्ति उठाई है। ये लोग शायद ये भूल गये हैं कि यह अरजोई कोई भारत सरकार का राष्टरीय गान नहीं है जिसको गाने के लिए सरकार ने नियम लागू किए हैं। अपने भगवान की आरती गाने के सबके अपने तरीके हैं और सबके अपने शब्द व संगीत, यदि समानता है तो केवल भावना व आस्था का। सबकी भावना एक होती है - महाराज की अर्चना न कि महाराज का अपमान। महाराज व उनके उसूलों की रक्षा करना हर दासधर्म अनुयायियों का परम कर्तव्य है। वैसे भी कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की धार्मिक भावना को ठेस नहीं पहुचा सकता, उसके द्वारा अपनाई गयी धार्मिक परम्पराओं में हस्ताक्षेप नहीं कर सकता।
4- कुछ अनुयायियों का मानना है कि हूजूर महारज दर्शन दास जी ने लोनी स्थित सचखण्ड नानक धाम में स्थापित सरोवर को वरदान दिया था इसलिए उस वरदान का प्रयोग किसी अन्य जगह के लिए नहीं करना चाहिए। ऐसा सोचने वालों की सोच पर तरस आता है कि वे कितने बुध्दिविहीन व अज्ञानी हैं। महाराज ने एक सरोवर को वरदान दिया, उनका वरदान इतना छोटा और संकुचित था जो फुटों में अथवा मीटरों में नापा जा सके। महाराज का वरदान तो वह दान था जो उनके भक्तों को विदेशों में बैठे बैठे मिलता है। उनके अनुयायी यदि गंदे नाले के पानी को महाराज का वरदान समझ कर पियेगें तो उनके लिए वह भी अमृत साबित होगा और यदि लोनी सरोवर स्वार्थी, अज्ञानी व तानाशाहों के घेरे में रहेगा तो वहां किसी भी प्रकार का वरदान नहीं रहेगा। कृपया मीटरों में नापे जाने वाले सरोवर को न देखना छोडें और अनुयायियों की महाराज के प्रति भक्ति को महसूस करें जो कण-कण्ा में महाराज दर्शन दास जी का दर्शन पाते हैं चाहे वह लोनी की मिट्टी का कण हो या अलिपुर का, नजफगढ़ का या फिर लंदन या अमरीका का। अनुयायी की भावना में भक्ति होगी तो उसके घर में भी सरोवर होगा। आप धारा प्रवाह बहने वाले इस किस सरोवर को रोकने का प्रयत्न कर रहे हैं।
5- चर्चा है कि महाराज दर्शन दास जी द्वारा तीन सचखण्ड नानक धाम स्थापित किये गये हैं तथा महाराज जी के हुकमानुसार वहीं चार रगों का निशान साहिब झुलाया जा सकता है, अन्य किसी जगह पर नहीं। बंधुवर, मुझे इस बात का दुख है कि हुजूर महाराज ने समयाभाव के कारण तीन ही सचखण्ड नानक धाम की स्थापना की। यदि समय दास अनुयायियों पर और मेहरबान होता तो स्वयं महाराज ने सैकड़ों धाम स्थापित किए होते और उन सभी पर उनके द्वारा दिया गया निशान सहिब झूल रहा होता। बंधु! निशान साहिब एक धर्म का प्रतीक है जो महाराज ने उस समय तक स्थापित कर दिए गये मंदिरों पर झुलाया गया। क्या आप कोई ऐसा गवाह प्रस्तुत कर सकते हैं जिसके सामने स्वयं महाराज ने उसे कहीं और न झुलाने का हुकम दिया हो। दासधर्म का निशान साहिब तो हर एक दास अनुयायी का सम्मान है जिसे वह अपने मन मंदिर में झुलाना चाहता है। यदि महाराज ने ऐसा कोई आदेश दिया था तो मुझे अचरज है कि स्वयं हनुमान जी पर कि उन्होंने ऐसा आदेश क्यों नही दिया कि उनकी लाल पताका केवल उन मंदिरों पर झुलाया जाए जो उनके समय में स्थापित कर दिए गये थे। मुझे अचरज होगा सिक्खों के दसों गुरूओं पर कि उन्होंने अपना निशान साहिब केवल उन गुरूद्वारों पर झुलाने का आदेश क्यों नहीं दिया जो उनके समय में बनाए गये। शायद यह बताने की जरूरत नहीं है कि आज हर गुरूद्वारे की अलग प्रबन्धक कमेटी है और हर मंदिर की अलग संचालक समिति एक है तो उनका धर्म, उनकी विचारधारा, उनकी परम्पराएं, उनकी संस्कृति जैसे कि दास धर्म की मान्यताएं, इसकी विचारधारा और इसके उसूल जिसे कोई अलग नहीं कर सकता, न मैं, न आप और न कोई और, यहां तक कि स्वयं हुजूर महाराज भी आज यह नहीं चाहते।
6- आपको आपत्ति है कि महाराज दर्शन दास जी के स्वरूप के साथ कोई भी अपनी फोटो नहीं लगा सकता। क्या महाराज की फोटो का कापीराईट आपने लिया हुआ है। मैं अपने घर में, अपने कार्यालय में, अपने वाहन में एक साथ अपने भगवान और गुरू दोनों का एक साथ फोटो लगा सकता हूं। ऐसा अधिकार स्वयं मेरे भगवान और मेरे गुरू ने मुझे दिया है। ऐसा करने से मुझे कोई भी सरकारी, सामाजिक, आध्यात्मिक या धार्मिक कानून नहीं रोक सकता। यह मेरा धर्म है, मेरी आस्था है या मेरी नीयती है कि मैं अपने गुरू और भगवान को किस रूप में मान सम्मान दूं। जिस रूप से मैं उनका आदर सम्मान करूंगा, उसी रूप में उनको पाउंगा। मेरी भक्ति आपको फल नहीं दे सकती या मेरे पापों को आप नहीं भुगत सकते। हुजूर महाराज मेरे भगवान हैं तो मेरे गुरू हैं - महाराज घसीटा राम कंत जी या महाराज चढ़विंदा दास जी या फिर महाराज त्रिलोचन दास जी। हां! एक बात और संस्था सदस्यों की होती है न कि किसी व्यक्ति विशेष की। संस्थानों पर तस्वीरें लगाई जाती हैं सदस्यों की ओर से न कि किसी व्यक्ति विशेष की ओर से। अब यदि किसी संस्थान के सदस्य अपने भगवान के साथ अपने गुरू की तसवीर लगाना चाहे तो उसे रोकने का मतलब है उसकी धार्मिक भावना का अपमान करना जो धर्म विरोधी भी है और कानूनी अपराध भी।
आज हुजूर महाराज दर्शन दास जी की पुण्य तिथि है और ऐसे अवसर पर हम लोगों में प्रेम भाव बढ़ाने के नाम पर आपस में द्वेष-भाव रखें क्या हमें शोभा देता है, समाज से गंदगी साफ करने की आड़ में एक-दूसरे पर कीचड. उछालें, क्या यही दास धर्म के उसूल हैं, दास अनुयायियों की सफेद व उजली वर्दी पहनकर अंधकार में गोते खाऐं और काले कारनामों में लिप्त रहें। पुण्य तिथि के अवसर पर ऐसा नहीं है कि स्वयं हूजूर महाराज हमारे बीच नहीं है - वे यहीं कही हमारी बगल में खड़े हमें और हमारे कर्मों को देख रहे हैं। यदि हम गलत करेंगे तो उसका फल हमें अवश्य मिलेगा - यहीं इसी जमीं पर, इसी जहां में और इसी जन्म में। मेरा सब कुछ मेरे गुरू को अर्पण है तो मेरा-तेरा किस लिए।
आओ आज हूजूर महाराज की शान में हम शपथ लें कि अपने मन में आने वाली हर बुरी भावना, द्वेष, अहंकार और लालच का त्याग कर दास धर्म को जानें, पहचानें, वास्तविक जीवन में अपनाएं और समाज के अन्य दुखियारों का कल्याण करें ताकि सदगुरू को खुशी हो कि मैं जो दास सजा कर आया वो 'देव' बन सचखण्ड में समाने योग्य बनें न कि दानव बन नरक कुण्ड में सड़ने लगें।
नानक नाम चढ़दी कला, तेरे भाणे सरबत दा भला।

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